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 अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं
'फ़राज़' अब ज़रा लहजा बदल के देखते हैं

जुदाइयाँ तो मुक़द्दर हैं फिर भी जान-ए-सफ़र
कुछ और दूर ज़रा साथ चल के देखते हैं

रह-ए-वफ़ा में हरीफ़-ए-ख़िराम कोई तो हो
सो अपने आप से आगे निकल के देखते हैं

तू सामने है तो फिर क्यूँ यक़ीं नहीं आता
ये बार बार जो आँखों को मल के देखते हैं

ये कौन लोग हैं मौजूद तेरी महफ़िल में
जो लालचों से तुझे मुझ को जल के देखते हैं

ये क़ुर्ब क्या है कि यक-जाँ हुए न दूर रहे
हज़ार एक ही क़ालिब में ढल के देखते हैं

न तुझ को मात हुई है न मुझ को मात हुई
सो अब के दोनों ही चालें बदल के देखते हैं

ये कौन है सर-ए-साहिल कि डूबने वाले
समुंदरों की तहों से उछल के देखते हैं

अभी तलक तो न कुंदन हुए न राख हुए
हम अपनी आग में हर रोज़ जल के देखते हैं

बहुत दिनों से नहीं है कुछ उस की ख़ैर-ख़बर
चलो 'फ़राज़' को ऐ यार चल के देखते हैं

©Jashvant

Gazal by Ahmad Faraz @Ek Alfaaz Shayri ADV.काव्या मझधार @Mukesh Poonia Puneet Arora Sunny @Parul (kiran)Yadav PФФJД ЦDΞSHI @vineetapanchal Dr.M

189 View

#ਸ਼ਾਇਰੀ

Ahmad Fraz

135 View

#Videos
 कश्ती तो भंवर में है

हमारी अभी तक 

किनारों से रूबरू होना चाहते हैं


बहुत बड़ा है,  दरिया ये दुनिया का


अब तो खुद में खोना चाहते हैं

©SHIVAM SINGH TOMAR

Saad Ahmad ( سعد احمد )

288 View

 Tafseer Ahmad Saifi

©Tafseer Ahmad Saifi

Tafseer Ahmad Saifi

90 View

Tafseer Ahmad Saifi

99 View

 अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं
'फ़राज़' अब ज़रा लहजा बदल के देखते हैं

जुदाइयाँ तो मुक़द्दर हैं फिर भी जान-ए-सफ़र
कुछ और दूर ज़रा साथ चल के देखते हैं

रह-ए-वफ़ा में हरीफ़-ए-ख़िराम कोई तो हो
सो अपने आप से आगे निकल के देखते हैं

तू सामने है तो फिर क्यूँ यक़ीं नहीं आता
ये बार बार जो आँखों को मल के देखते हैं

ये कौन लोग हैं मौजूद तेरी महफ़िल में
जो लालचों से तुझे मुझ को जल के देखते हैं

ये क़ुर्ब क्या है कि यक-जाँ हुए न दूर रहे
हज़ार एक ही क़ालिब में ढल के देखते हैं

न तुझ को मात हुई है न मुझ को मात हुई
सो अब के दोनों ही चालें बदल के देखते हैं

ये कौन है सर-ए-साहिल कि डूबने वाले
समुंदरों की तहों से उछल के देखते हैं

अभी तलक तो न कुंदन हुए न राख हुए
हम अपनी आग में हर रोज़ जल के देखते हैं

बहुत दिनों से नहीं है कुछ उस की ख़ैर-ख़बर
चलो 'फ़राज़' को ऐ यार चल के देखते हैं

©Jashvant

Gazal by Ahmad Faraz @Ek Alfaaz Shayri ADV.काव्या मझधार @Mukesh Poonia Puneet Arora Sunny @Parul (kiran)Yadav PФФJД ЦDΞSHI @vineetapanchal Dr.M

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Ahmad Fraz

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 कश्ती तो भंवर में है

हमारी अभी तक 

किनारों से रूबरू होना चाहते हैं


बहुत बड़ा है,  दरिया ये दुनिया का


अब तो खुद में खोना चाहते हैं

©SHIVAM SINGH TOMAR

Saad Ahmad ( سعد احمد )

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 Tafseer Ahmad Saifi

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